पी एस सी के विद्यार्थी की झूठी हंसी और सच्चा दर्द एक कहानी | LIFE OF STUDENT

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LIFE OF STUDENT

पी एस सी के विद्यार्थी की झूठी हंसी और सच्चा दर्द एक कहानी | LIFE OF STUDENT

प्रिय दोस्तों मै आलोक कुमार आज मै जो कहानी आपको सुना रहा हूँ वह उस कहानी से आप पहले ही परिचित है जी हाँ हो आपकी अपनी कहानी है इस कहानी को तब पढियेगा जब आपके पास समय हो क्योकि हो सकता है आपके आँखों के सामने आपकी बीती हुई जिन्दगी वापस आ जाए

यह कहानी किसी एक की नहीं अधिकतर विद्यार्थियों की है जो प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे PSC, VYAPAM, SSC, RAILWAY ARMY जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते है हर साल सैंकड़ो या हजारो या शायद इससे भी अधिक विद्यार्थी अपनी कालेज की पढ़ाई पूरी करके बिलासपुर , रायपुर , इंदौर ,इलाहबाद या दिल्ली प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जाते है हो सकता है शायद आप भी उनमे से एक हो

आँखों में सरकारी नौकरी का सपना और आगे आने वाली परिवार की जिम्मेदारी लेकर हम सभी बड़े शहरो में अपनी किस्मत आजमाने आते है छोटे छोटे कमरों में वो भी कमरों को शेयर करके यहाँ रहते है क्योकि हम मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे है हमारे पास इतने पैसे नहीं होते की हम अकेले कमरा ले सके या किसी होटल में रुक सके

छोटे छोटे कमरों में हम रहते है और घर से अनाज लाकर अपना खाना खुद बनाकर खाकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते है क्योकि हममे से अधिकतर विद्यार्थी ऐसे होते है जिनके पास दो टाइम का टिफिन लगाने के भी पैसे नहीं होते है

घर में जहां सुबह उठते ही चाय और नास्ता मिलता है शहरो में आने के बाद वह अपने आप छूट जाता है क्योकि उसमे भी तो पैसे लगते है साहब कभी चाय पी ली कभी नहीं पी नास्ते में रात का बचा हुआ भात हमारी भूख मिटाता है

सुबह होते ही हम कोचिंग की ओर निकल जाते है वापस आकर फिर अपने 10 बाई 10 के कमरे में या इससे भी छोटे कमरे में फिर अपना खाना बनाकर खाकर पढ़ाई शुरू कर देते है दूसरे लोगो और रिश्तेदारों को लगता है वाह बिलासपुर , रायपुर , इंदौर पढने गया है या गई है बढ़िया ऐश कर रहे होंगे पर उनके एक बार गुजारिश है की आप आकर देखे हम कितना ऐश कर रहे होते है

घर से जब भी माँ बाबूजी का फोन आता यही लाइन पहले कही जाती है कोई परीक्षा निकली क्या सच बताना दिल धक् से रह जाता है माँ बाप की भी गलती नहीं है मध्यम वर्गीय परिवार में बच्चे को बाहर भेजकर पढ़ाना बड़ा कठिन होता है

इसलिए 1 या दो साल के बाद तो हम घर वालो से बात करने से भी कतराने लगते है क्योकि हम जानते है की उनका पहला सवाल क्या होगा रिश्तेदारों से तो मिलने में डर लगता है क्योकि वो सबसे पहले यह पूछेंगे क्या कर रहा है कहीं नौकरी लगी

जब कभी शहर में हमारे आस पास गणेश पूजा , दुर्गा पूजा , आदि होती है और भोग का वितरण किया जाता है तो विद्यार्थियों की भीड़ लग जाती है माफ़ करना दोस्तों वह भोग हमारे लिए केवल प्रसाद नहीं बल्कि पेट भरने का साधन होता है क्योकि उससे एक दिन का खाने का पैसा बच जाता है

जैसे ही सरकारी किसी भी परीक्षाओं की घोषणा करती है सच मानो वह दिन हमारे लिए दशहरा दिवाली से कम नहीं होता है हर विद्यार्थी उस दिन बड़ा खुश रहता है क्योकि आँखों में एक सपना दिखने लगता है की इस बार बहुत अधिक परिश्रम करूंगा और यह सरकारी नौकरी हासिल कर लूँगा जिससे की वापस अपने घर अपने गाँव जा सकू कुछ लोगो का सपना पूरा हो भी जाता है और कुछ लोगो के हाथ निराशा लगती है

फिर भी साहब हम विद्यार्थी बड़े ही ढीट होते है दो दिन सबसे छुपकर रोते है और फिर कैसी नयी वेकेंसी के आने पर फिर से तैयारी में लग जाते है करें भी क्या और कोई चारा नहीं है यहाँ नौकरी कौन अपने लिए चाहता है हम तो नौकरी इस लिए चाहते है ताकि अपने परिवार का सपना पूरा कर सके अपने परिवार का बोझ उठा सके क्योकि हम माध्यम वर्गीय परिवार के विद्यार्थी है ना

मित्रो सच कहू यह एक काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि हम सबकी जिन्दगी का एक हिस्सा है अगर आपको यह अच्छी लगी हो या आपकी भी आखें इसे पढ़कर नम हो गई हो आपको भी कुछ याद आ गया हो तो इसे अपने उस दोस्त तक भी शेयर कर देना जो शायद इस कहानी से सम्बंधित हो

कहानी कैसी लगी नीचे कमेन्ट में आवश्यक लिखना मै आपसे फिर मिलूंगा तब तक के लिए मुझे विदा दीजिये आपका आलोक कुमार

 

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